Dr. Anil Paliwal

श्रीकृष्ण

हरि तो सों तेरे निकट, तू पुनि फिरत उदास । मृग कस्तूरी नाभि में, फिर फिर ढूँढै घास ।।

अर्थात, परमात्मा (हरि) तुम्हारे बहुत पास यानी तुम्हारे भीतर ही हैं, फिर भी तुम उन्हें बाहर खोजते हुए, दुखी होकर भटक रहे हो।

जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में ही सुगंध होती है, लेकिन वह उसे जंगल में इधर-उधर खोजता फिरता है।

ईश्वर हमसेबाहर नहीं है, अपितु यह हमारे भीतर ही है। हमारी आत्मा में ही परमात्मा का निवास है।

मनुष्य अज्ञान के कारण बाहरी दुनिया (धन, वस्तु, संबंध) में सुख खोजता है।वास्तविक आनंद और शांति अंतरात्मा में मिलती है।

मलूकदास जी का यह दोहा हमें बताता है कि हम जीवनभर “कुछ न कुछ पाने” की दौड़ में लगे रहते हैं, लेकिन जो हमारे लिए सबसे मूल्यवान है (शांति, आनंद, ईश्वर), वह तो हमारे अंदर ही विद्यमान है।

हमारे अंदर परमात्मा को खोजने के लिए मन को अंतरमुखी करने आवश्यकता है जो कि आत्म-चिंतन और ध्यान से ही सम्भव हो पाएगा।

हम ईश्वर को मंदिरों, तीर्थों, कथा-कीर्तनों में, भौतिक वस्तुओं में खोजते हैं, जबकि वह तो हमारे हृदय में ही विराजमान है।

अब इस दोहे को भगवद्गीता के प्रकाश में समझते हैं।

1 ईश्वर हमारे भीतर ही हैं
गीता (अध्याय 18, श्लोक 61):
“ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति”
(भगवान सब प्राणियों के हृदय में ही स्थित हैं।)

यही बात दोहे में कही गई है “हरि तो सों तेरे निकट” अर्थात् हरि (भगवान) तुमसे दूर नहीं, तुम्हारे भीतर ही हैं।

2 अज्ञान के कारण ही हम परमात्मा को बाहर खोजते हैं।
गीता (अध्याय 7, श्लोक 15 ):“न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते”
(अज्ञानी लोग मुझे नहीं पहचानते।)

“तू पुनि फिरत उदास” मनुष्य अज्ञान के कारण दुखी होकर बाहर भटकता रहता है।

3 आत्मा में ही आनंद है
गीता (अध्याय 6, श्लोक 20-21):सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥ २१॥

जब मनुष्य ध्यान में स्थित होता है, तो वह आत्मा में ही परम आनंद का अनुभव करता है।यह ठीक वैसे ही है जैसे- मृग की नाभि में कस्तूरी की सुगंध व्याप्त है, पर वह उसे बाहर खोजता फिरता है।

4 भगवान श्रीकृष्ण का स्पष्ट संदेश
गीता (अध्याय 10, श्लोक 20): “अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः”

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ।

अंतिम सार (गीता + दोहा): ईश्वर बाहर नहीं — भीतर हैं. दुख का कारण — अज्ञान और बाहरी खोज. समाधान — ध्यान, आत्मचिंतन, अंतर्मुखी होना

इसलिए संत और भगवान श्रीकृष्ण दोनों एक ही बात कहते हैं: “अपने भीतर देखो — वही परम सत्य है।”

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हरि ॐ युंजान

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