अधिकांश विद्वानों का मानना है कि पुराणों का अंतिम रूप गुप्त काल (लगभग छठी सदी) में तैयार हुआ। समय के साथ इनमें नई-नई कहानियाँ और प्रसंग जोड़े जाते रहे, लेकिन बाद में यह प्रक्रिया लगभग रुक गई। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि उस समय के बाद भारतीय साहित्य और दर्शन में नए विचारों का विकास धीमा पड़ गया।
हालाँकि, भारतीय नवजागरण के साथ फिर से नए विचार और सोच का विकास शुरू हुआ, जो एक अच्छी बात है।
महाभारत को अक्सर पुराणों में गिना जाता है, लेकिन यह पूरी तरह इतिहास भी नहीं है और केवल कहानी या कविता भी नहीं है। इसका उद्देश्य केवल घटनाएँ बताना नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अर्थ समझाना भी है। इसलिए इसे समझने के लिए हमें सरल और संतुलित दृष्टि रखनी चाहिए।

Leave a Reply