आध्यात्मिक होने का अर्थ है यह समझ लेना कि हम स्वयं अपने आनंद के स्रोत हैं। आध्यात्मिकता का संबंध मनुष्य के भीतरी जीवन से है, और इसकी शुरुआत उसकी अंतर्यात्रा से होती है।
जो भी कार्य मनुष्य को शुद्ध, शांत, संतुलित बनाते हैं, उसे भीतर से आनंद और पूर्णता का अनुभव कराते हैं—वे सभी आध्यात्मिकता के अंतर्गत आते हैं।
ज्ञानी कहते हैं कि “शून्य में विराट समाया है और विराट में भी शून्य है।” अर्थात, जो व्यक्ति इस शरीर में रहते हुए ही इस सत्य को समझ और अनुभव कर लेता है, वही वास्तव में आध्यात्मिक कहलाता है।

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