सारथ्यं पार्थस्य कृत्वा गीतामृतं ददौ। लोकत्रयोपकाराय तस्मै कृष्णात्मने नमः॥ अर्थात, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सारथी बनकर तीनों लोकों के कल्याण हेतु गीता का उपदेश दिया।
पद्म पुराण के प्रमुख श्लोक जो गीता के माहात्म्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं:-
पद्म पुराण के इन श्लोकों में श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। फिर भी पद्म पुराण में लिखा है कि
शक्यते केन तद्वक्तुं गीता माहात्म्यमुत्तमम्॥
अर्थात ….गीता की महिमा अत्यंत गूढ़ है, उसे पूर्ण रूप से कहना कठिन है। वास्तव में
कृष्णो जानाति वै सम्यक् किंचिद् व्यासः सुतः शुकः। याज्ञवल्क्यो जनकश्चान्ये गीता माहात्म्यमुत्तमम्॥ अर्थात गीता का पूर्ण माहात्म्य केवल भगवानK श्रीकृष्ण, व्यासजी, शुकदेवजी, जनक जी, याज्ञवल्क्यजी आदि ही जानते हैं।
श्लोक १
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥
इस श्लोक का सरल अर्थ है कि सभी उपनिषद गाय हैं, भगवान श्रीकृष्ण ग्वाला हैं, अर्जुन बछड़ा है, और गीता अमृत रूपी दूध है।
श्लोक २
संसारसागरं घोरं तर्तुमिच्छति यो नरः। गीतानावं समासाद्य पारं याति सुखेन सः॥ इस श्लोक का सरल अर्थ है कि जो व्यक्ति संसार रूपी सागर से पार होना चाहता है, वह गीता रूपी नाव से आसानी से पार हो जाता है।
श्लोक ३
गीताज्ञानं श्रुतं नित्यं यः करोति सदा नरः। स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपलिप्यते॥सरल अर्थ: जो व्यक्ति नित्य गीता का ज्ञान सुनता/पढ़ता है और श्रीमद्भगवद्गीता के अभ्यास में लगा हुआ है, वह मनुष्य प्रारब्ध-कर्म को भोगता हुआ , इस लोक में सुखी और कर्मों के बंधन से सदैव मुक्त रहता है।
श्लोक ४
गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान्। विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः॥
अर्थात, जो श्रद्धा से गीता का पाठ करता है, वह भय और शोक से मुक्त होकर भगवान को प्राप्त होता है।
श्लोक ५
गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च। नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च। यानी जो गीता का अध्ययन करता है, उसके पूर्व जन्म के पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक ६
मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने। सकृद् गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्॥
इस श्लोक का अर्थ है कि जल से शरीर की शुद्धि होती है, परन्तु गीता रूपी जल में एक बार स्नान करने से जीवन के समस्त पाप मिट जाते हैं।
श्लोक ७
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥
अर्थात, गीता का सही अध्ययन ही पर्याप्त है, क्योंकि यह स्वयं भगवान के मुखारविंद से निकली है।
श्लोक ८
भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनिःसृतम्। गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥
वस्तुतः गीता महाभारत का सार है। इसका पान करने से जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है।
श्लोक ९
सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः। सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्ववेदमयो मनुः॥
गीता सभी शास्त्रों का सार है, जैसे भगवान सभी देवताओं में समाए हैं।
श्लोक १०
गीतायाः पुस्तकं यत्र यत्र पाठः प्रवर्तते। तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै॥
अर्थात, जहाँ गीता का पाठ होता है, वहाँ सभी तीर्थ उपस्थित हो जाते हैं।
श्लोक ११
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये। गोपाला गोपिकावृन्दाः नारदोद्धवपार्षदैः॥
जहाँ गीता का पाठ होता है, वहाँ देवता, ऋषि, योगी और नारद आदि उपस्थित रहते हैं।
श्लोक १२
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते। यत्र गीता विचारेण पठ्यते तत्राहमस्थितः॥
इस श्लोक का अर्थ है कि जहाँ गीता का अध्ययन होता है, वहाँ भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उपस्थित रहते हैं।
श्लोक १३
गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारमुत्तमम्। गीता मे ज्ञानमत्युग्रं गीता मे ज्ञानमव्ययम्॥
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि गीता मेरा हृदय है, यह मेरा सर्वोत्तम और अमर ज्ञान है।
निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि उपर्युक्त श्लोकों का सार यह है कि गीता केवल एक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह ईश्वर का हृदय है। इसका अध्ययन मनुष्य को पाप, भय और दुःख से मुक्त करता है। गीता जीवन को सही दिशा प्रदान करते हुए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।

Leave a Reply