राधा-कृष्ण का प्रेम
राधा-कृष्ण का प्रेम सामान्य मानवीय प्रेम से भिन्न माना जाता है; इसे अतींद्रिय और आध्यात्मिक प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति समझा गया है। शृंगार और धर्म—दोनों प्रकार के साहित्य में इस प्रेम को विशेष स्थान प्राप्त है। श्रीकृष्ण को एक ऐतिहासिक और परिपूर्ण पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, जबकि राधा को प्रकृति अथवा प्रेम की प्रतीकात्मक प्रतिमा के रूप में देखा गया। कवियों और कलाकारों ने राधा-कृष्ण के प्रेम को अनेक भावों में चित्रित किया और शृंगार-रस की चरम अभिव्यक्ति के लिए परकीयाभाव का सहारा लिया। कालांतर में जब इस प्रेम को केवल इंद्रियजन्य कामभाव से जोड़ा गया, तब उसमें वासना का तत्व जुड़ गया; जबकि मूलतः यह प्रेम इंद्रियों से परे, निर्मल और आध्यात्मिक है।
कथानुसार राधा और कृष्ण लगभग ग्यारह वर्ष की अवस्था में अलग हो जाते हैं और जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव झेलने के बाद वृद्धावस्था में अंतिम समय पर फिर मिलते हैं। तब तक राधा अत्यंत वृद्ध और अशक्त हो चुकी होती हैं और कृष्ण भी जीवन के दुःखों से व्यथित होते हैं। फिर भी उनके मिलन में वही बाल्यकाल का निष्कलुष प्रेम विद्यमान रहता है। इससे स्पष्ट होता है कि उनका संबंध केवल बाहरी या शारीरिक नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक है। इसलिए राधा-कृष्ण का प्रेम कार्यरूप से अधिक कारणरूप और अतींद्रिय प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
हरि ॐ युंजान

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