श्रीमद्भगवतगीता का माहात्म्य और महत्व क्या है

श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य (महिमा) और महत्व अत्यंत गहन और व्यापक है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, जिसमें जीवन जीने की कला (Art of Living) सिखाने वाला दिव्य ज्ञान है, अपितु यह Art of Leaving(त्याग की कला) पर व्यावहारिक जीवन संस्कृति का उपदेश प्रदान करती है।

गीता का माहात्म्य (महिमा)

“माहात्म्य” का अर्थ है, महानता, महिमा, और दिव्यता।श्रीमद्भगवद्गीता की महानता और दिव्यता को सार रूप में इस सत्य और तथ्य से समझा जा सकता है कि श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित उपदेश स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण केवचन हैं। वे सीधे भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविंद से निकले हैं। इसलिए ही इसे ईश्वर की वाणी या सन्देश अथवा उपदेश कहा जाता है।

जिस प्रकार सूर्य स्वयं प्रकाश देता है, वैसे ही गीता स्वयं ज्ञान का प्रकाश देती है।

2 सभी उपनिषदों का सार/ निचोड़/ निष्कर्ष:-

गीता को “उपनिषदों के सार” का प्रत्यक्ष स्वरूप स्वीकार गया है। निम्नांकित श्लोक इस कथन/ सत्य की पुष्टि करता है:-

सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्॥ अर्थात, सभी उपनिषद गाय हैं, भगवान श्रीकृष्ण ग्वाला हैं, अर्जुन बछड़ा है, और गीता अमृत रूपी दूध है।

3 जीवन प्रत्येक समस्या/प्रश्न/ संकट का समाधान:-

गीता में धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति, योग, आत्मा, मृत्यु-सभी विषयों से जुड़े हुए प्रश्नों के समाधान ढूंढे जा सकते हैं। इसलिए ही इसे जीवन का मार्गदर्शक ग्रंथ कहा जाता है।

4 दुःख,संकट और तनाव से मुक्ति का आधार

जब अर्जुन आसक्ति , मोह, और दुःख में डूबे थे, और विषादग्रस्त थे तब तब गीता के ज्ञान ने उन्हें तनाव मुक्त किया था। गीता का ज्ञान सुनने के बाद अर्जुन की बुद्धि स्थिर चित्त हुई थी। गीता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जीवन में जब भी तनाव या विषाद या Tension हो और कहीं भी समाधान नहीं मिल रहा हो तब केवल मात्र गीता का अध्य्यन करने से कुछ समय बाद तनाव से मुक्ति मिल जाती है तथा मन से बैचेनी दूर हो जाती है और नवीन ऊर्जा की अनुभूति होती तथा मानसिक शांति मिलती है एवं इसके उपदेश जीवन में कार्य करने के लिए आवश्यक ऊर्जा भर देते हैं और के साहस की अनुभूति मिलती है।

गीता का महत्व (Importance)

1गीता सही और उचित कर्म का मार्ग दिखाती है

गीता कर्मयोग के मूलभूत गुणों को सरल भाषा में बताती है।

गीता सिखाती है कि व्यक्ति को अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित (focus) करना चाहिए न कि उसके(कर्म के) परिणाम पर । गीता हमें निर्देशित करती है कि मनुष्य को कर्म करते वक्त उसके फल की चिंता/दुश्चिंता (Tension) नहीं करनी चाहिए। इससे मनुष्य पूर्ण रूप से तनाव मुक्त होकर अपना कर्तव्य पूर्ण मनोयोग से कर सकता है। इस संदर्भ में गीता का सबसे ज्यादा प्रचलित और स्वीकार्य श्लोक है:

*कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…।*

कर्मण्येवाधिकारस्ते: कर्म (कर्तव्य) में ही तुम्हारा अधिकार है।

मा फलेषु कदाचन: लेकिन उसके फल (परिणाम) पर कभी नहीं।(२/४७)

2 गीता आत्मा और परमात्मा का ज्ञान (ज्ञानयोग)

गीता हमें बताती है कि आत्मा या मनुष्य की चेतना अमर है।

शरीर बदलता रहता है परन्तु आत्मा नहीं बदलती। यह स्थिर है। इसमें कोई भी परिवर्तन नहीं हो सकता।

न जायते म्रियते वा कदाचित्…(२/२०)

यह आत्मा किसी भी काल (समय) में न जन्म लेती है और न ही मरती है। इस उपदेश से मनुष्य में मृत्यु का भय समाप्त होता है।

3 गीता भक्ति का महत्व (भक्तियोग)

गीता में स्पष्ट रूप से उपदेश दिया गया है कि सच्चे प्रेम और श्रद्धा से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।

भक्त्या मामभिजानाति(१८/५५) …

भक्ति के द्वारा ही मुझे (भगवान को) जाना जा सकता है।

4 गीता मन को नियंत्रित करने का तरीका सिखाती है

गीता कहती है —

मन ही मित्र है, और मन ही शत्रु। उद्धरेदात्मनाऽत्मानं(६/५)…

मनुष्य को अपने मन के द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र भी वह स्वयं है, और सबसे बड़ा शत्रु भी वह स्वयं है। यदि हम अपने मन को सही दिशा दें तो हम अपने जीवन में ऊँचाई पर पहुँच सकते हैं। और, यदि मन को भटकने दें तो हम पतन की ओर जाते हैं। इस उपदेश से व्यक्ति अपने मन पर नियंत्रण रखने की प्रेरणा सीखता है।

5 गीता का ज्ञान प्रत्येक युग के लिए उपयोगी है

गीता केवल महाभारत काल के लिए ही नहीं, बल्कि आज के तनावपूर्ण जीवन में भी उतनी ही उपयोगी है।

विद्यार्थी जीवन में गीता के उपदेश मन की एकाग्रता को बढ़ाते हैं इससे विद्यार्थी को अध्ययन करते समय अपना ध्यान पुस्तकों मूलभूत केंद्रीय सिद्धांतों पर focus करने में मदद मिलती है।

विभिन्न संस्थाओं, MNCs, और कॉर्पोरेट में विभिन्न पदों पर कार्यरत कर्मचारियों के लिए गीता कर्तव्यनिष्ठा और समर्पण का संदेश प्रसारित करती है।

गृहस्थ जीवन में संतुलित जीवन जीने के लिए गीता के उपदेश प्रेरणादायी होते हैं तथा मानसिक संतुलन स्थापित करने में मदद करते हैं।

गीता के संदेश परम् तत्व की साधना में लगे हुए साधकों के लिए जीवन मुक्ति एवं मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

गीता का वास्तविक संदेश (सार)

गीता हमें कर्म, ज्ञान और भक्ति से सम्बंधित तीन प्रमुख बातें सिखाती है।

1 सही और उचित कर्म करो ( कर्मयोग )

2 सच्चा ज्ञान प्राप्त करो ( ज्ञानयोग )

3 परम् सत्ता(भगवान) में प्रेम रखो ( भक्तियोग )

और गीता अंततोगत्वा हमें सम्पूर्ण समर्पण (शरणागति) का आदेश प्रदान करती है:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता का माहात्म्य यह है कि यह ईश्वर की वाणी और समस्त वेदों का सार है और इसका महत्व यह है कि यह मनुष्य को तनाव मुक्त जीवन जीने, दुःख से मुक्त होने और परम सत्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाती है।

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