श्रीमद्भगवद्गीता को निम्नांकित शब्दों में विभाजित किया जा सकता है:- श्री, मद्, भग, वद्,( भगवद्), गीता रूप में विभाजित करके समझा जा सकता है।
1 श्री का सरल अर्थ लक्ष्मी, ऐश्वर्य, सौभाग्य, दिव्यता होता है।
2 मद् (मत्) यानी धारण करना या किसी से युक्त होना। “मद्” संस्कृत का एक प्रत्यय (suffix) है, जिसका अर्थ होता है: युक्त होना / से युक्त / से संपन्न होना, जिसमें कोई गुण विद्यमान हो “श्रीमद्” में “मद्” का प्रयोग जैसे: श्री + मद् = श्रीमद् इसका अर्थ हुआ: जो “श्री” (ऐश्वर्य, सौंदर्य, मंगल) से युक्त हो। मद् शब्द को उदाहरण से समझने पर इसका अर्थ शीघ्र समझ में आ जाता है।
1धन + मद् = धनवान (धनमद् का भाव) यानी धन से युक्त
2 गुण + मत् (मद् का ही रूप) = गुणवान अर्थात गुणों से युक्त।
3 बुद्धि + मत् = बुद्धिमान यानी बुद्धि से युक्त
विशेष बात “मद्” और “मत्” दोनों एक ही अर्थ देते हैं इनका केवल शब्द के अनुसार अपना रूप बदल जाता है श्री + मद् = श्रीमद् गुण + मत् = गुणवान बुद्धि + मत् = बुद्धिमान
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि “मद्” का अर्थ “से युक्त / से भरपूर” है। इसलिए श्रीमद् का अर्थ है जो श्री (दिव्यता, ऐश्वर्य) से परिपूर्ण हो या युक्त हो। श्रीमद् यानी जो दिव्यता, सौंदर्य और ऐश्वर्य से युक्त हो
2 भगवद् या “भगवत्” शब्द “ भगवान ” को दर्शाता है। भगवान शब्द में भग का अर्थ निम्नलिखित 6 गुणों का बताता है:-
इस प्रसंग में आप भलीभांति समझने का प्रयास करें कि भग का अर्थ यहाँ पर स्त्री की योनि का द्योतक नहीं है अपितु,“भग” शब्द का अत्यंत गूढ़ और महत्वपूर्ण है तथा इसे व्यापक और दार्शनिक अर्थ के रूप में प्रयुक्त किया गया है। भग पवित्र और आध्यात्मिक गुणों के समुच्चय को कहते हैं। आइए इसे सरल और सही रूप में समझते हैं।
“भग” का शास्त्रीय अर्थ दिव्य, ऐश्वर्य एवं परम उच्च गुणों के समूह के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। विष्णु पुराण में “ भग ” के विशेष रूप से, 6 मुख्य दिव्य गुण बताए गए हैं। ये हैं:-
1 ऐश्वर्य (संपत्ति, प्रभुत्व)
2 वीर्य (शक्ति, सामर्थ्य)
3 यश (कीर्ति, प्रसिद्धि)
4 श्री (सौंदर्य, समृद्धि)
5 ज्ञान (पूर्ण ज्ञान)
6 वैराग्य (आसक्ति का अभाव)
अब हम वेद शब्द को समझेंगे।
“वद्” संस्कृत का एक महत्वपूर्ण धातु या बीज रूप है। इसका अर्थ संदर्भ के अनुसार बदल सकता है। वद् का मूल अर्थ बोलना, कहना, संवाद करना या वचनN देना।
वद् धातु से कई शब्द बनते हैं:
वदति अर्थात वह बोलता है।
वदन यानी मुख
संवाद यानी किसी के साथ बात करना।
प्रवाद यानी प्रचलित कथन
“श्रीमदभगवद्गीता” शब्द में “वद्” का अर्थ “भगवद्” यानी भगवान से है।
यहाँ “वद्” अलग से “बोलना” नहीं दर्शाता अपितु “भगवान से संबंधित” (भगवान का)।
सरल निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि “भगवद्गीता” में वद् भगवान से ही सम्बद्ध है।
“वान” का अर्थ क्या है?
संस्कृत में “वान” (प्रत्यय) का अर्थ होता है: गुणों को धारण करने वाला।
धनवान – जिसके पास धन हो
गुणवान – जिसके पास गुण हों
बलवान – जिसके पास बल हो।
भग + वान = भगवान
अर्थात 6 दिव्य गुणों को धारण करने वाला।
“भगवान” का पूरा अर्थ है, 6 दिव्य गुणों को धारण करने वाला।
“गीता” शब्द का अर्थ बहुत गहरा और आध्यात्मिक है।
शाब्दिक अर्थ: गाया हुआ ज्ञान
आध्यात्मिक अर्थ: ऐसा ज्ञान जो हृदय को छूता है।
गीता का भावार्थ — ज्ञान, संगीत और अनुभूति का संगम है।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गाया गया दिव्य, पवित्र और ऐश्वर्ययुक्त ज्ञान एवं उपदेश को समझाया गया है।
अब हम श्रीमद्भगवद्गीता को जरा गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। यह केवल “मधुर गीत” नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का सम्पूर्ण विज्ञान (Science of Life) है इसमें:- कर्म (Action), भक्ति (Devotion), ज्ञान (Wisdom), योग (Discipline), इन सबका समन्वय देखने को मिलता है सार रूप में हम कह सकते हैं कि “श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के महासमर या युद्ध के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा जीवन की दिव्यता और भव्यता को पूर्ण रूप से जीने के सरल मार्गदर्शन का उल्लेख करती है।

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