तुलसी पत्ते की महिमा

भागवत पुराण को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि नारद द्वारा श्रीकृष्ण को दान में माँगने और तुलसी-पत्र से तराजू बराबर होने की कथा वहाँ सीधे रूप में नहीं मिलती।भागवत के दशम स्कन्ध में भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका-लीलाएँ, उनकी रानियाँ जैसे रुक्मिणी,सत्यभामा, जाम्बुवंती, कालिंदी इत्यादि तथा देवर्षि नारद के कई प्रसंग तो मिलते हैं, लेकिन “तुलाभार (तराजू में तौलना)” वाली पूरी कथा भागवत में नहीं पाई जाती है। मुख्यतः, यह प्रसंग बाद की वैष्णव परम्पराओं और लोककथाओं में प्रसिद्ध हुआ है। इसे प्रायः “तुला-भार लीला” कहा जाता है। इस प्रकार की कथाओं का उल्लेख गर्ग संहिता, दक्षिण भारतीय कृष्ण-भक्ति परम्पराएँ , हरिकथा , पुराण-कथा और लोक-कथाओं में देखा जा सकता है।

इन परम्पराओं में कथा का मुख्य उद्देश्य भक्ति की महिमा दिखाना है। श्रीकृष्ण और नारद के सम्बंध में एक लोक प्रचलित प्रसिद्ध कथा सुनने को मिलती है जिसमें देवर्षि नारद और भगवान श्रीकृष्ण की रानियों के बीच एक रोचक प्रसंग बताया गया है। यह कथा भक्ति, दान और भगवान की लीला को समझाने के लिए कही जाती है। एक बार देवर्षि नारद द्वारका आए। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण की रानियाँ अत्यंत सुख-समृद्धि में रहती हैं और श्रीकृष्ण उनसे अत्यंत प्रेम करते हैं।

नारद ने सोचा कि इन रानियों की भक्ति की परीक्षा ली जाए। नारद जी ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा-“राजन्! आपने कहा था कि आप मुझे दान देंगे। अब मैं आपसे दान माँगना चाहता हूँ।”

श्रीकृष्ण मुस्कराए और बोले-“देवर्षि! जो चाहो मांग लो।”तब नारद जी ने कहा-“मैं आपको ही दान में लेना चाहता हूँ।”

इसे सुनकर सभा में उपस्थित सभी लोग चकित रह गए। जब नारद ने श्रीकृष्ण को दान में माँग लिया तो रानियाँ (जैसे रुक्मिणी, सत्यभामा इत्यादि) घबरा गईं, द्वारिका में तहलका मच गया क्योंकि शास्त्र के अनुसार जो वस्तु दान में दी जाए वह वापस नहीं ली जा सकती।अब प्रश्न यह था कि यदि श्रीकृष्ण नारद को दे दिए गए तो रानियाँ अब क्या करेंगी और द्वारिका का क्या होगा ?

नारद ने कहा-“यदि तुम श्रीकृष्ण को वापस लेना चाहती हो तो उनके बराबर का मूल्य चुकाना होगा।” भला, श्रीकृष्ण के बराबर का मूल्य कौन चुका सकता है…?चूंकि, श्रीकृष्ण अखण्ड ब्रह्मांड के अधिपति हैं, इसलिए उनके बराबर का मूल्य चुकाना सम्भव ही नहीं है।

फिर भी,एक बड़ी तुला (तराजू) लाई गई। एक पलड़े में श्रीकृष्ण बैठ गए और दूसरे में रानियों ने सोना, हीरे, जवाहरात, आभूषण आदि बहुमूल्य वस्तुओं को भरना शुरू किया तथा द्वारिकवासियों ने भी जो कुछ भी उनके पास बहुमूल्य था, तराजु के पलड़े में रख दिया, लेकिन घोर आश्चर्य! इतना धन रखने पर भी तुला बराबर नहीं हुई।

फिर नारद जी से ही इसका समाधान पूछा। नारद जी ने कहा कि इसका समाधान तो सिर्फ राधा जी बता सकती हैं।

रुक्मिणी जी को राधाजी के पास भेजा गया। रुक्मिणी जी ने राधा जी को अपनी समस्या बताई और समाधान हेतु निवेदन किया।

भगवान की सरल और निश्चल भक्ति से अभिप्रेरित होकर राधा जी ने एक तुलसी का पत्ता रुक्मिणी जी को दिया और मन ही मन प्रार्थना की- “ है कान्हा, यदि मेरी भक्ति आपके प्रति सच्ची और निश्चल है तो यह तुलसी पत्र ही पर्याप्त होगा।”

जैसे ही रुक्मिणीजी ने द्वारिका पहुंच कर तुलसी पत्र को तराजू के दूसरे पल्ले में रखा, वह तुरंत ही श्रीकृष्ण के बराबर हो गया और श्रीकृष्ण का पलड़ा हल्का हो गया।

इस बोध कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भगवान को सोना-चाँदी से नहीं अपितु निश्चल प्रेम और भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है।”

इस प्रकार श्रीकृष्ण फिर रानियों के साथ आनंद पूर्वक रहने लगे।

अब आप इस विषय में विचार करें कि तुलसी पत्र/ पत्ते की इतनी महिमा क्यूँ है…?

हरि ॐ युंजान

🌹💐🌳🙏

Share this story:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *